तलाक-ए-हसन पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त सवाल: क्या यह प्रथा आधुनिक समाज में जारी रहनी चाहिए
PKN Live | तलाक-ए-हसन की मुस्लिम प्रथा पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की। इस प्रथा में मुस्लिम पुरुष तीन महीने तक हर महीने एक बार तलाक बोलकर विवाह समाप्त कर सकता है। कोर्ट ने पूछा कि जब समाज बराबरी और dignity की बात करता है, तब ऐसी प्रथा को कब तक जारी रखा जाएगा।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि यह सिर्फ व्यक्तिगत कानून का मामला नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रभाव वाला मुद्दा है। अदालत इस प्रथा को खत्म करने या इसमें सुधार लाने पर विचार कर सकती है। यह संकेत भी दिया गया कि आवश्यक हुआ तो मामला बड़ी संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाएगा।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वर्ष 2025 में भी ऐसी व्यवस्था का चलना सोचने पर मजबूर करता है। कोर्ट ने पक्षों से संक्षिप्त लिखित जवाब मांगा है, जिसके बाद इसे पांच जजों की बेंच के सुपुर्द करने पर अंतिम निर्णय होगा।
यह टिप्पणी Muslim Personal Law, Gender Equality, Marriage Rights जैसे मुद्दों को नए सिरे से national debate में ला रही है।
हिंदू महिलाओं की विरासत पर सुप्रीम कोर्ट का सुझाव: अपनी संपत्ति के लिए महिलाओं को Will जरूर बनानी चाहिए
एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Hindu Succession Act की धारा 15(1)(b) पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। मौजूदा कानून के मुताबिक यदि किसी हिंदू महिला की मृत्यु बिना वसीयत (Will) के हो जाती है, तो उसकी संपत्ति पर उसके पति के परिवार का अधिकार माना जाता है। याचिका में इसे असंवैधानिक बताकर चुनौती दी गई थी।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने महिलाओं को सलाह दी कि वे अपनी संपत्ति को लेकर life-time में Will जरूर तैयार करें। अदालत ने कहा कि विवाद की स्थिति में पक्षकारों को पहले pre-litigation mediation और लोक अदालत का रास्ता अपनाना होगा। यदि समझौता नहीं होता, तब अदालत में संवैधानिक चुनौती दी जा सकती है।
यह फैसला महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा, property autonomy, inheritance equality और Women Empowerment जैसे मुद्दों को मजबूत करता है। लाखों परिवारों में महिला की मृत्यु के बाद संपत्ति संबंधी विवाद आम हैं, इसलिए अदालत की यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जिला जज पदोन्नति में विशेष कोटा की मांग खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, HJS में सभी अधिकारी बराबर
जिला जज के पद पर प्रमोशन के दौरान विशेष कोटा, वेटेज या अलग श्रेणी की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अगुआई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि Higher Judicial Service में आने के बाद अधिकारियों के बीच अंतर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि कोई अधिकारी चाहे direct recruitment के जरिए हो, regular promotion से हो या Limited Departmental Competitive Examination के माध्यम से—सभी समान माने जाएंगे।
Selection Grade और Super Time Scale केवल seniority और merit पर ही आधारित होंगे, न कि इस पर कि अधिकारी किस रास्ते से HJS में आया।
अदालत ने साफ कर दिया कि lower judiciary में लंबे समय तक काम करना भी जिला जज पद के लिए अलग श्रेणी बनाने का आधार नहीं बन सकता।
यह टिप्पणी Judicial Service Reform, Merit-based Promotion, Equality in Judiciary का स्पष्ट संकेत देती है।
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग बनाने का आदेश: सरकार को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
ट्रिब्यूनल से जुड़े सुधारों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फिर चेताया कि न्यायाधिकरणों से संबंधित ढांचा अभी भी अधूरा है और कई मामले लंबित पड़े हैं। कोर्ट ने कहा कि जब तक tribunals की कार्यप्रणाली, नियुक्ति प्रक्रिया और स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होती, संसद नए कानून लागू नहीं कर सकती।
अदालत ने केंद्र को National Tribunal Commission बनाने का निर्देश दिया, जो:
न्यायाधिकरणों में नियुक्ति
उनकी कार्यप्रणाली
पारदर्शिता
स्वतंत्रता
इन सभी को व्यवस्थित करेगा।
कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि 2021 में Finance Act से जुड़े कई प्रावधान असंवैधानिक घोषित किए जा चुके हैं क्योंकि वे न्यायालयों की स्वतंत्रता को प्रभावित करते थे।
ये टिप्पणियां Tribunal Reform, Judicial Independence, Administrative Transparency, Rule of Law को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के चार फैसलों ने शुरू की नई बहस
इन चार मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां दर्शाती हैं कि अदालत अब outdated traditions, discriminatory laws और flawed legal processes को बदलने की दिशा में अधिक सक्रिय है।
चाहे talaq-e-hasan हो या Hindu women inheritance, judicial promotions की公平ता हो या tribunals की स्वतंत्रता—अदालत ने यह साफ कर दिया कि आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में कानून का उद्देश्य समानता, गरिमा और न्याय सुनिश्चित करना है।


