PKN LIVE : सात साल पहले जब Brahmos Scientist Nishant Agarwal को ‘पाकिस्तान के लिए जासूसी’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तब यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बन गया था। लेकिन अब, 2024 में Bombay High Court की नागपुर बेंच ने उनके खिलाफ दी गई सजा को पलटते हुए उनकी आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अग्रवाल ने अपने लैपटॉप से प्राप्त सामग्री का उपयोग किसी विदेशी शक्ति के लाभ के लिए किया या देश की सुरक्षा को खतरे में डाला।
मामला क्या था?
निशांत अग्रवाल, जो कि ब्रह्मोस एयरोस्पेस के एक पूर्व वैज्ञानिक थे, पर आरोप था कि उन्होंने भारत के मिसाइल कार्यक्रमों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) को लीक की। यह आरोप था कि उन्होंने फर्जी फेसबुक और लिंक्डइन खातों का इस्तेमाल कर यह जानकारी साझा की। यह मामला 2018 में सामने आया था जब उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने अग्रवाल के नाम से जुड़े दो संदिग्ध फेसबुक खातों का पता लगाया था, जो इस्लामाबाद से ऑपरेट हो रहे थे।
अग्रवाल को अक्टूबर 2018 में गिरफ्तार किया गया था और उन पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। बाद में, एक निचली अदालत ने उन्हें जीवन भर की सजा और 14 साल की कठोर सजा सुनाई थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट का निर्णय
हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने अब उनकी सजा को पलटते हुए यह स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि अग्रवाल ने जानबूझकर या बिना किसी उचित कारण के गोपनीय या संवेदनशील सामग्री किसी विदेशी शक्ति को लीक की। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अग्रवाल ने 2013 से 2017 के बीच किसी संवेदनशील जानकारी को अपने व्यक्तिगत डिवाइस पर कॉपी किया और इसका उपयोग या वितरण किया।
न्यायमूर्ति अनिल किलो और प्रवीन पटिल की बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अग्रवाल का कोई उद्देश्य था जिससे भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को खतरा हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित नहीं किया कि अग्रवाल ने अपने द्वारा प्राप्त सामग्री को जानबूझकर साझा किया।
अदालत का प्रमुख अवलोकन
बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने यह नहीं साबित किया कि अग्रवाल ने 2013 में कोई संवेदनशील या गोपनीय जानकारी लीक की थी। कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि जब अग्रवाल ने कथित लिंक्डइन अकाउंट ‘सीजल कपूर’ से बात की थी, तो वह केवल नौकरी की तलाश में थे और उनका उद्देश्य कोई गुप्त जानकारी साझा करना नहीं था। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत कोई भी साक्ष्य यह नहीं दिखा सका कि अग्रवाल ने जानबूझकर कोई संवेदनशील जानकारी साझा की थी।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष ने केवल इस तथ्य का हवाला दिया कि अग्रवाल ने एक गोपनीयता समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन कोई ठोस साक्ष्य नहीं प्रस्तुत किए गए थे यह दिखाने के लिए कि उन्होंने जानबूझकर गोपनीय जानकारी साझा की हो।
अभियोजन पक्ष की कमजोरी
निशांत अग्रवाल के खिलाफ अभियोजन का मुख्य आधार यह था कि उनके लैपटॉप पर ‘सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल’ और ‘ब्राह्मोस’ जैसे संवेदनशील विषयों पर डेटा था, जो उन्होंने कथित तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े फेसबुक और लिंक्डइन खातों के साथ साझा किया था। इसके अतिरिक्त, उनके लैपटॉप पर तीन प्रकार के मालवेयर के संकेत पाए गए थे, जो डेटा चोरी करने के लिए प्रसिद्ध थे। हालांकि, अदालत ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि इस डेटा का उपयोग भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ किया गया था।
निशांत अग्रवाल की सफाई
अग्रवाल की तरफ से उनकी वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने जो डेटा डाउनलोड किया था, वह जानबूझकर नहीं किया था और वह केवल नौकरी की तलाश में थे। उन्होंने यह भी कहा कि लिंक्डइन अकाउंट पर आए लिंक, जो मालवेयर से संक्रमित थे, उन्हें वह अनजाने में डाउनलोड कर चुके थे। इसके अलावा, कोई ठोस प्रमाण नहीं था कि अग्रवाल ने जानबूझकर कोई गोपनीय जानकारी लीक की हो।
अग्रवाल के पक्ष में अदालत ने यह पाया कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित नहीं किया कि अग्रवाल ने किसी भी संवेदनशील जानकारी का दुरुपयोग किया या इसे किसी विदेशी ताकत के लाभ के लिए साझा किया।
Brahmos के साथ अग्रवाल की यात्रा
निशांत अग्रवाल ने 2013 से 2018 तक ब्रह्मोस एयरोस्पेस में काम किया था। उन्हें 2018 में DRDO युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से नवाजा गया था। उनके काम की गुणवत्ता को उनके पर्यवेक्षक ने ‘बेहद अच्छा’ और ‘उOutstanding’ के रूप में सराहा था।
अग्रवाल को 2014 में नागपुर भेजा गया था, जहां उन्होंने ब्रह्मोस मिसाइलों की डिलीवरी से जुड़ी गोपनीय जानकारी तक पहुंच बनाई थी। हालांकि, अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि उनकी पहुंच संवेदनशील जानकारी तक केवल एक सामान्य कार्य जिम्मेदारी के रूप में थी, न कि किसी जानबूझकर गोपनीयता उल्लंघन के रूप में।
कोर्ट का आदेश और आगे की प्रक्रिया
बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले से अब यह स्पष्ट हो गया है कि अभियोजन पक्ष अग्रवाल के खिलाफ अपनी बात साबित करने में विफल रहा है। अदालत ने यह फैसला सुनाया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से साबित नहीं हुए, और इसके आधार पर उनकी सजा को रद्द कर दिया गया।
यह निर्णय उनके लिए राहत की बात है, क्योंकि अब वे जेल से रिहा हो सकते हैं। अदालत ने केवल Section 5(1)(d) के तहत हल्की सजा को बनाए रखा है, जो कहता है कि कोई व्यक्ति अगर अनजाने में गोपनीय जानकारी रखने का दोषी पाया जाता है, तो उसे सजा दी जा सकती है।


