PKN Live | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगभग चार दशक पुराने उस संवेदनशील मामले को फिर से उजागर कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि ललितपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने खुले अदालत कक्ष में सेशन जज को थाने तक घसीटकर ले जाने की धमकी दी थी। अदालत ने इस गंभीर आरोप को अत्यंत चिंताजनक बताते हुए उत्तर प्रदेश के DGP से विस्तृत हलफनामा मांगा है।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने वृंदावन व अन्य अपीलों की सुनवाई के दौरान पाया कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में इस धमकी का उल्लेख मौजूद है। फैसले में स्पष्ट लिखा है कि तत्कालीन SP Lalitpur ने अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाते हुए एक अपराधी की तरह व्यवहार किया और न्यायाधीश को धमकाया।
यह मामला लगभग 40 वर्ष पुराना है, लेकिन हाईकोर्ट ने पहली बार इस पर औपचारिक संज्ञान लिया है। अदालत ने यह जानने की आवश्यकता महसूस की कि उस समय इस आपराधिक कदाचार पर क्या कार्रवाई की गई थी और संबंधित अधिकारी की वर्तमान स्थिति क्या है।
हाईकोर्ट के सामने खुला पुराना रिकॉर्ड, ट्रायल जज की टिप्पणी ने चौंकाया
सुनवाई के दौरान जब खंडपीठ ने 1988 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पढ़ा, तो उसमें दर्ज टिप्पणियों ने न्यायालय को हैरान कर दिया। फैसले में लिखा था कि तत्कालीन SP ने अदालत की कार्यवाही चल रही होने के बावजूद सेशन जज को धमकाया, और उन्हें जबरन थाने ले जाने की चेतावनी दी थी।
यह घटना न सिर्फ कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सीधा हमला मानी जा रही है। अदालत ने कहा कि यदि यह घटना सच है, तो उस समय यह “power misuse” और “judicial interference” का गंभीर उदाहरण था।
SP B.K. Bhola पर हाईकोर्ट ने पूछा—जीवित हैं या नहीं, सेवा में हैं या रिटायर्ड
खंडपीठ ने इस बात पर भी चिंता जताई कि लगभग 40 साल बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि आरोपित अधिकारी बीके भोला अब इस दुनिया में हैं या नहीं। कोर्ट ने DGP को आदेश दिया है कि वह हलफनामा दाखिल कर यह साफ करें कि:
बीके भोला जीवित हैं या नहीं
यदि जीवित हैं, तो उनका वर्तमान पता, पद, स्थिति और कोई भी सेवा संबंधी विवरण
क्या वे पेंशन ले रहे हैं या सेवा से जुड़ी किसी स्थिति में हैं
क्या उनके विरुद्ध कभी विभागीय या कानूनी कार्रवाई हुई
यदि कार्रवाई हुई थी, तो उसकी प्रक्रिया, परिणाम और संबंधित दस्तावेज क्या हैं
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इतने वर्षों बाद भी अधिकारी की स्थिति अज्ञात होना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है और राज्य को इस पर स्पष्टता देनी होगी।
DGP को 9 दिसंबर तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP से कहा है कि 9 दिसंबर तक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए। हलफनामे में निम्न बिंदु अनिवार्य रूप से शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं:
बीके भोला की वर्तमान स्थिति:
जीवित हैं या नहीं, यदि जीवित हैं तो उनकी उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और निवास स्थान।सेवा स्थिति:
क्या वे सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, या किसी रूप में अभी भी सक्रिय हैं। यदि रिटायर्ड हैं, तो क्या उन्हें पेंशन मिल रही है।विभागीय कार्रवाई:
1988 के निर्णय में ट्रायल जज के निर्देशों के आधार पर क्या कार्रवाई की गई थी। यदि कोई कार्रवाई नही हुई, तो उसके कारणों को स्पष्ट किया जाए।अदालती रिकॉर्ड और कागज़ात:
उस समय की जांच रिपोर्ट, विभागीय नोटिंग, आक्षेप पत्र, सेवा रिकॉर्ड, और किसी भी दंड का विवरण।अधिकारी की वर्तमान लोकेशन और संपर्क सूचना:
अदालत को पूर्ण डिटेल दी जाए कि अधिकारी कहाँ रहते हैं, किस थाने या जिले से उनका अंतिम संबद्ध था और उनके विरुद्ध दर्ज किसी भी अन्य शिकायत की जानकारी क्या है।
कोर्ट ने कहा—न्यायपालिका को धमकाना एक गंभीर अपराध, इसे कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायपालिका पर इस तरह की धमकी “law enforcement ethics” और “judicial independence” के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
अदालत की टिप्पणी:
“यदि कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुलेआम ट्रायल जज को डराने की कोशिश करता है, तो यह न्यायिक संस्थान की गरिमा पर सीधा हमला है। राज्य को इस घटना की पूरी सच्चाई सामने रखनी ही होगी।”
अदालत का यह रुख बताता है कि भले ही घटना 40 साल पुरानी हो, लेकिन judicial integrity, public accountability, और police misconduct जैसे मुद्दे समय सीमा से परे हैं।
घटना के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर एक नजर
मामला 1980 के दशक का है, जब ललितपुर में एक आपराधिक मुकदमा चल रहा था। आरोप है कि मुकदमे के दौरान अचानक माहौल तनावपूर्ण हो गया और तत्कालीन District Superintendent of Police, बीके भोला, अदालत कक्ष में ही न्यायाधीश से अभद्रता पर उतर आए।
ट्रायल जज की टिप्पणी के अनुसार:
SP ने एक सामान्य नागरिक की तरह नहीं, बल्कि “गुंडे की तरह” व्यवहार किया
जज को थाने तक खींच ले जाने की धमकी दी
अदालत की प्रक्रिया को बाधित किया
और न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाई
ट्रायल जज ने इस घटना को फैसले में दर्ज किया था, जिससे यह तथ्य आज भी उपलब्ध है। उसी दस्तावेज़ को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने इस पुरानी फाइल को फिर से खोला है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला | High Court Review Importance
यह केस सिर्फ एक व्यक्तिगत धमकी का मामला नहीं है। इसमें कई बड़े सवाल शामिल हैं:
1. Judicial Independence
यदि एक सेशन जज को धमकी दी जा सकती है, तो आम नागरिक की सुरक्षा पर इस प्रणाली का क्या असर होगा।
2. Police Accountability
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के आचरण की जवाबदेही तय न होना, “police reforms” और “public trust” दोनों को प्रभावित करता है।
3. Rule of Law
कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने की पहल की है कि कोई भी अधिकारी कानून से ऊपर नहीं होता।
4. Institutional Memory
राज्य सरकार के पास इतने गंभीर मामले का रिकॉर्ड उपलब्ध न होना प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
DGP के हलफनामे से खुलेंगे कई राज
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब DGP विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करेंगे, तब कई महत्वपूर्ण जानकारी सामने आएगी:
क्या 1988 के बाद सरकार ने मामले को दबा दिया
क्या SP के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई
क्या उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी
या पूरा मामला प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम था
यह भी पता चलेगा कि बीके भोला की वर्तमान स्थिति क्या है। चूंकि यह मामला “public office misconduct” और “abuse of authority” से जुड़ा है, इसलिए रिपोर्ट का हर हिस्सा महत्वपूर्ण होगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश ने 40 साल पुराने एक ऐसे प्रकरण को पुनर्जीवित कर दिया है, जिसे बमुश्किल कोई याद करता था, लेकिन जिसने न्यायिक इतिहास में अपनी छाप छोड़ी थी।
यह मामला सिर्फ एक धमकी का नहीं, बल्कि judicial dignity, police accountability, और rule of law की कसौटी पर खरा उतरने का अवसर है।
9 दिसंबर तक DGP द्वारा दाखिल की जाने वाली रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि उस समय राज्य ने इस गंभीर घटना को कैसे संभाला और क्या आज भी उस पर कोई कार्रवाई संभव है।