PKN Live | इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और उसके राजस्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराज़गी जाहिर करते हुए अवैध तोड़फोड़ और बिना सूचना रेवेन्यू रिकॉर्ड बदलने के एक मामले में राज्य सरकार पर ₹20 लाख की लागत लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी नागरिक की संपत्ति को बिना सुनवाई नष्ट कर देना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह शासन तंत्र की मनमानी और संवेदनहीनता को भी दर्शाता है।
यह मामला रायबरेली जिले से जुड़ा है, जहाँ याचिकाकर्ता की जमीन पर बने ढांचे को सरकारी अमले ने बिना किसी नोटिस के गिरा दिया। इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह रही कि जमीन से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव भी चुपचाप कर दिया गया, जिसकी जानकारी याचिकाकर्ता को तब मिली जब उसका मकान पहले ही मलबे में तब्दील हो चुका था।
मामले की पृष्ठभूमि
इस प्रकरण की शुरुआत संतदीन नामक व्यक्ति से होती है, जिन्होंने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम (U.P.Z.A.L.R. Act) की धारा 229-B के तहत अपनी भूमि के अधिकार को लेकर मुकदमा दायर किया था। यह मुकदमा उनके पक्ष में तय हुआ और इसके आधार पर राजस्व अभिलेखों में उनका नाम विधिवत दर्ज कर दिया गया।
बाद में संतदीन के निधन के पश्चात यह संपत्ति उनके बेटे और भाई के नाम चली गई। वर्ष 2021 में याचिकाकर्ता और उनकी बहन ने यह भूमि कानूनी रूप से क्रय की। इसके बाद 24 फरवरी 2021 को पारित आदेश के जरिये उनके नाम भी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो गए।
अचानक चला बुलडोज़र
24 मार्च 2025 को, बिना किसी पूर्व सूचना, बिना नोटिस और बिना सुनवाई के, प्रशासन ने याचिकाकर्ता की संपत्ति पर तोड़फोड़ की कार्रवाई कर दी। जब याचिकाकर्ता ने विरोध किया, तब उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ 10 फरवरी 2025 को उत्तर प्रदेश रेवेन्यू कोड की धारा 38(5) के तहत कोई आदेश पारित किया गया था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि यह आदेश न तो उन्हें कभी दिखाया गया और न ही इसकी जानकारी दी गई। पूरी कार्रवाई उनकी अनुपस्थिति में, एकतरफ़ा तरीके से की गई।
हाई कोर्ट की शरण में याचिकाकर्ता
प्रशासन की इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया। कोर्ट के सामने यह दलील रखी गई कि म्यूटेशन संबंधी पूरी कार्यवाही बिना नोटिस के की गई, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया है कि किसी भी संरचना को गिराने से पहले संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
रिकॉर्ड और अफसरों की जवाबदेही
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश रेवेन्यू कोड से जुड़े सभी मूल दस्तावेज तलब किए। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत हलफनामे भी मांगे गए।
सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (न्यायिक), तहसील सदर, रायबरेली को भी इस मामले में सीधे तौर पर पक्षकार बनाया गया।
दस्तावेजों और हलफनामों की जांच के बाद कोर्ट इस नतीजे पर पहुंची कि अधिकारियों ने न तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया और न ही याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का मौका दिया।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी
न्यायमूर्ति आलोक माथुर ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि—
“केवल विवादित आदेश को निरस्त कर देना याचिकाकर्ता को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसकी संपत्ति को अवैध रूप से नष्ट किया गया है।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अधिकारी संतदीन के पक्ष में पहले से मौजूद वैध आदेश से पूरी तरह अवगत थे, इसके बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया। इससे यह साफ होता है कि पूरी प्रक्रिया मनमानी और दुर्भावनापूर्ण थी।
अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई
सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (न्यायिक) द्वारा दाखिल हलफनामे को लेकर भी कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि न तो अधिकारी ने यह स्पष्ट किया कि किस अधिकार के तहत यह आदेश पारित किया गया और न ही यह नकारा कि कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई।
इस आधार पर कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के संपत्ति के संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ है।
20 लाख की लागत और सख्त निर्देश
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने न केवल विवादित आदेश को रद्द किया, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹20 लाख की लागत भी लगाई।
इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि—
याचिकाकर्ता को उसकी भूमि का कब्ज़ा तुरंत सौंपा जाए
यह जांच की जाए कि इस अवैध कार्रवाई के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार थे
यह राशि उन्हीं दोषी अधिकारियों से वसूली जाए, न कि सरकारी खजाने से
प्रशासन को कड़ा संदेश
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यह मामला सिर्फ कानून के उल्लंघन का नहीं है, बल्कि यह हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की खुली अवहेलना का उदाहरण है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को यह सलाह भी दी कि राजस्व अधिकारियों को उचित कानूनी प्रशिक्षण दिया जाए, क्योंकि वे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों की सबसे मूल्यवान संपत्ति—उनकी ज़मीन—से जुड़े फैसले लेते हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल याचिकाकर्ता के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ एक सख्त चेतावनी भी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह राज्य ही क्यों न हो।