क्या GDA ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को गुमराह किया? श्याम पार्क के विवादित निर्माण ने फिर खड़े किए बड़े सवाल

PKN Live | गाजियाबाद के साहिबाबाद स्थित श्याम पार्क मेन में एक कथित अवैध निर्माण को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। इस बार बहस का केंद्र केवल अवैध निर्माण नहीं, बल्कि वह सवाल है जो प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया दोनों से जुड़ा हुआ है—क्या अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और मौके की वास्तविक स्थिति में कोई अंतर था?

स्थानीय निवासी पवन शर्मा द्वारा लगाए गए आरोपों और हाल में सामने आए सरकारी दस्तावेजों ने इस मामले को नया आयाम दे दिया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि जिस निर्माण को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है, वह आज भी अस्तित्व में है, जबकि अदालत में यह बताया गया था कि अवैध निर्माण हटा दिया गया है। दूसरी ओर, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) की हालिया रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भवन के खिलाफ ध्वस्तीकरण आदेश अब भी प्रभावी हैं और अंतिम कार्रवाई अभी बाकी है।

 

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद साहिबाबाद के श्याम पार्क मेन स्थित मकान संख्या 412, गली नंबर-2 से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता पवन शर्मा का आरोप है कि वर्ष 2018 में इस भवन का निर्माण नियमों की अनदेखी करते हुए किया गया था। उनका कहना है कि निर्माण के दौरान सार्वजनिक सड़क और गली के हिस्से पर भी अतिक्रमण किया गया, जिससे स्थानीय निवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

पवन शर्मा के अनुसार, उन्होंने इस संबंध में कई बार गाजियाबाद विकास प्राधिकरण, नगर निगम और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की। शिकायतों की जांच के बाद प्राधिकरण ने निर्माण को नियमों के विपरीत मानते हुए कार्रवाई शुरू की और भवन को सील भी किया गया।

हालांकि शिकायतकर्ता का आरोप है कि बाद में सील तोड़ दी गई और भवन का उपयोग फिर से शुरू हो गया। उनका कहना है कि इस संबंध में पुलिस और प्रशासन को भी जानकारी दी गई, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।

प्रशासनिक कार्रवाई से अदालत तक

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लगातार शिकायतों के बावजूद समाधान न मिलने पर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। पवन शर्मा ने वर्ष 2019 में रिट याचिका संख्या 31494/2019 दाखिल कर न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की।

याचिका में कहा गया कि सार्वजनिक भूमि और सड़क पर अवैध निर्माण किया गया है तथा संबंधित विभाग प्रभावी कार्रवाई करने में असफल रहे हैं।

सुनवाई के दौरान गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने न्यायालय को बताया कि उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम, 1973 के तहत कार्रवाई की जा चुकी है और विवादित निर्माण को सील किया गया है।

वहीं निर्माण पक्ष की ओर से यह कहा गया कि कथित अवैध निर्माण पहले ही हटा दिया गया है और अब किसी अतिरिक्त कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है।

इन तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 9 अप्रैल 2024 को याचिका का निस्तारण कर दिया। अपने आदेश में न्यायालय ने कहा कि यदि भविष्य में यह पाया जाता है कि सार्वजनिक भूमि या सड़क पर कोई अतिक्रमण मौजूद है, तो संबंधित प्राधिकरण कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा।

दो साल बाद फिर क्यों उठा विवाद?

मामला उस समय फिर चर्चा में आया जब फरवरी 2026 की एक आधिकारिक निस्तारण रिपोर्ट सामने आई। यह रिपोर्ट GDA के प्रवर्तन जोन-7 द्वारा तैयार की गई थी।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि संबंधित भवन के खिलाफ पहले ही ध्वस्तीकरण आदेश पारित किए जा चुके हैं। साथ ही यह भी दर्ज किया गया कि भवन वर्तमान में आबाद है और उसमें लोग निवास कर रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से पहले भवन को खाली कराना आवश्यक है। इसके लिए निवासियों को नोटिस जारी किए जाने की प्रक्रिया भी बताई गई।

यहीं से पूरे मामले में नए सवाल उठने शुरू हुए।

यदि भवन के विरुद्ध ध्वस्तीकरण आदेश पहले से प्रभावी हैं और भवन में लोग रह रहे हैं, तो क्या यह माना जाए कि भवन अब भी मौजूद है? और यदि भवन मौजूद है, तो अदालत में यह जानकारी कैसे दी गई कि अवैध निर्माण हटा दिया गया है?

यही वह बिंदु है जिसे लेकर शिकायतकर्ता लगातार सवाल उठा रहे हैं।

शिकायतकर्ता के आरोप

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पवन शर्मा का कहना है कि हालिया सरकारी रिपोर्ट और अदालत में प्रस्तुत तथ्यों के बीच स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है।

उनका दावा है कि यदि भवन पूरी तरह हटाया जा चुका होता, तो उसके विरुद्ध ध्वस्तीकरण आदेश लागू करने या भवन को खाली कराने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी शिकायत में पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि यह पता लगाया जाए कि क्या अदालत के समक्ष सभी तथ्य पूरी तरह प्रस्तुत किए गए थे या नहीं।

इसके साथ ही उन्होंने सार्वजनिक सड़क और गली पर कथित अतिक्रमण को हटाकर मार्ग को आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने की मांग भी की है।

सुरक्षा को लेकर भी चिंता

मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत में पवन शर्मा ने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी की है।

उनका कहना है कि वर्षों से इस मामले को उठाने और विभिन्न विभागों के समक्ष शिकायतें करने के कारण उन्हें संभावित खतरे की आशंका है। उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया है कि मामले की निष्पक्ष जांच के साथ-साथ उनकी सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाए।

GDA की वर्तमान स्थिति

17 फरवरी 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, GDA ने यह स्वीकार किया है कि संबंधित भवन के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है और ध्वस्तीकरण आदेश पारित हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भवन में निवास कर रहे लोगों को परिसर खाली करने के लिए नोटिस भेजे जाने की कार्रवाई की जा रही है। इसके बाद ही ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी।

हालांकि रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं करती कि अदालत में जिस निर्माण को हटाया हुआ बताया गया था, उसकी वर्तमान स्थिति क्या है और दोनों परिस्थितियों के बीच अंतर कैसे उत्पन्न हुआ।

बड़े सवाल जो अब भी अनुत्तरित हैं

इस पूरे विवाद के केंद्र में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—

  • यदि अवैध निर्माण हटाया जा चुका था, तो ध्वस्तीकरण आदेश अब भी प्रभावी क्यों हैं?
  • यदि भवन आज भी अस्तित्व में है, तो अदालत के समक्ष प्रस्तुत जानकारी और वर्तमान स्थिति में अंतर कैसे पैदा हुआ?
  • क्या संबंधित विभागों द्वारा सभी तथ्य न्यायालय के समक्ष रखे गए थे?
  • सार्वजनिक भूमि और सड़क पर कथित अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति क्या है?
  • ध्वस्तीकरण आदेश पारित होने के बाद भी अंतिम कार्रवाई में देरी क्यों हुई?

इन सवालों के जवाब फिलहाल किसी जांच या प्रशासनिक निर्णय के बिना स्पष्ट नहीं हैं।

अब आगे क्या?

फिलहाल यह मामला केवल एक भवन या एक शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक पारदर्शिता, अवैध निर्माणों पर कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया में प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्यों की सटीकता जैसे व्यापक मुद्दों को भी सामने ला रहा है।

स्थानीय नागरिकों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है। यदि भवन वास्तव में अवैध पाया जाता है और उसके विरुद्ध पारित आदेश लागू किए जाते हैं, तो यह कार्रवाई लंबे समय से लंबित विवाद का अंत हो सकती है।

वहीं यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी स्तर पर तथ्यों की प्रस्तुति में विसंगति रही है, तो इससे प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी नए प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि श्याम पार्क मेन का यह मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई, संभावित जांच और संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया ही यह तय करेगी कि विवादित निर्माण को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब आखिरकार क्या हैं।

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