PKN Live | Village Defence Guards: जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले के पहाड़ी और जंगलों से घिरे इलाकों में अब गांवों की सुरक्षा की कमान सिर्फ पुरुषों के हाथ में नहीं है। यहां की महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर आतंकवाद के खिलाफ खड़ी हैं। अनीता राज और सोनाली जैसी महिलाएं Village Defence Guards (VDG) के तौर पर सेना के साथ ट्रेनिंग ले रही हैं और अपने गांवों की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। Automatic weapons handling, patrol duty, firing practice और night vigilance जैसी ट्रेनिंग ने इन महिलाओं को आत्मनिर्भर सुरक्षा प्रहरी बना दिया है।
अनीता राज बताती हैं कि सर्दियों के मौसम में आतंकी गतिविधियां बढ़ जाती हैं। बर्फबारी और खराब मौसम का फायदा उठाकर पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ की कोशिशें होती हैं। ऐसे में VDG 24 घंटे अलर्ट रहते हैं। उनके मुताबिक, सेना की ट्रेनिंग से आत्मविश्वास बढ़ा है और अब वे किसी भी खतरे का सामना करने के लिए तैयार हैं। यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि जम्मू के दूर-दराज इलाकों में बदलते सुरक्षा मॉडल की है।

डोडा में VDG ट्रेनिंग कैंप: सेना के साथ गश्त और हथियारों की ट्रेनिंग
30 दिसंबर को डोडा के अलग-अलग गांवों में भारतीय सेना ने VDG ट्रेनिंग कैंप लगाए। इन कैंपों में जंगल और पहाड़ी इलाकों में patrol करना, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना, हथियारों को खोलना-जोड़ना और firing drills सिखाई जा रही हैं। यहां महिलाएं और युवा मिलकर ट्रेनिंग लेते हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में वे शुरुआती प्रतिक्रिया दे सकें।
डोडा की भौगोलिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है। कई गांवों तक पहुंचने के लिए सिर्फ पैदल रास्ते हैं। सड़कें सीमित हैं और एक घर से दूसरे घर के बीच लंबी दूरी है। ऐसे में अगर कहीं आतंकी मूवमेंट होता है तो सेना या पुलिस को पहुंचने में कई बार 4–5 घंटे लग जाते हैं। इसी गैप को भरने के लिए VDG मॉडल को मजबूत किया गया है, ताकि स्थानीय लोग ही पहली सुरक्षा पंक्ति बन सकें।
महिलाएं भी बनीं VDG: सुरक्षा और सशक्तिकरण का नया अध्याय
पिछले एक साल में डोडा की कई महिलाएं VDG का हिस्सा बनी हैं। घर के कामकाज के साथ-साथ वे सेना के साथ गांव की सुरक्षा भी कर रही हैं। सोनाली, जो एक साल से VDG में हैं, कहती हैं कि देश के लिए काम करने का गर्व अलग ही होता है। उनके अनुसार, वे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगी और जरूरत पड़ी तो आखिरी सांस तक लड़ेंगी।
महिलाओं की भागीदारी ने सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक सशक्तिकरण को भी बल दिया है। सुनसान पहाड़ियों में बसे घरों में अक्सर महिलाएं अकेली पड़ जाती थीं। अब हथियारों की ट्रेनिंग और संचार उपकरणों की उपलब्धता से उनकी सुरक्षा बढ़ी है और वे खुद को पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं।
VDC से VDG तक: नाम बदला, भूमिका और दायरा बढ़ा
पहले Village Defence Guards को Village Defence Committee (VDC) कहा जाता था। शुरुआती दौर में इसमें सिर्फ पुरुष शामिल होते थे। लेकिन पिछले साल से महिलाओं की भागीदारी बढ़ी और 2022 में गृह मंत्रालय के नए आदेश के बाद VDC को औपचारिक रूप से VDG का नाम दिया गया। इसके साथ ही automatic weapons की उपलब्धता और structured training ने इस व्यवस्था को और प्रभावी बना दिया।
ट्रेनिंग देने वाले अधिकारियों के मुताबिक, एक VDG ग्रुप में 10 से 15 लोग होते हैं। ग्रुप का लीडर आमतौर पर रिटायर्ड पुलिस या आर्मी अधिकारी होता है। लीडर के पास wireless set होता है, जिससे वह SSP, DM और आर्मी अधिकारियों के संपर्क में रहता है। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत साझा की जाती है।
Automatic weapons और आधुनिक ट्रेनिंग से बढ़ी क्षमता
VDG में शामिल युवाओं और महिलाओं को अब automatic weapons दिए जा रहे हैं। सुरिंदर कुमार बताते हैं कि पहले उन्हें .303 rifle से ट्रेनिंग दी जाती थी, लेकिन अब automatic हथियार मिलने से जवाबी कार्रवाई ज्यादा प्रभावी हो गई है। राजेश कुमार सिंह के अनुसार, समय-समय पर refresher training होती रहती है, जिससे हथियारों के संचालन में दक्षता बनी रहती है।
यह ट्रेनिंग सिर्फ फायरिंग तक सीमित नहीं है। इसमें हथियारों की maintenance, safe handling, night patrol techniques और terrain-based movement भी शामिल है। यही वजह है कि स्थानीय लोग अब आतंकियों की गतिविधियों पर पैनी नजर रख पा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत अलर्ट जारी कर रहे हैं।
1995 में VDC की शुरुआत: रियासी से शुरू हुई कहानी
VDG की जड़ें 1995 में रियासी जिले के बागनकोट गांव से जुड़ी हैं। उस समय आतंकियों ने गांव पर हमला किया था, जिसमें दो स्थानीय लोग मारे गए। गांव वालों के आक्रोश और साहस को देखते हुए तत्कालीन SSP ने स्थानीय लोगों को हथियार और ट्रेनिंग देने का फैसला लिया। यही भारत में पहली Village Defence Committee की शुरुआत थी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP एस.पी. वैद बताते हैं कि उस समय पुलिस मुख्यालय से अनुमति लेकर गांव वालों को .303 rifles और गोलियां दी गईं। गांव वालों ने साहस दिखाते हुए आतंकियों का मुकाबला किया और यही मॉडल बाद में डोडा, किश्तवाड़, राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में अपनाया गया।
पुलिस और सेना के होते हुए भी VDG क्यों जरूरी
यह सवाल अक्सर उठता है कि जब पुलिस और सेना मौजूद हैं तो VDG की जरूरत क्यों पड़ी। इसका जवाब जम्मू क्षेत्र की भौगोलिक जटिलताओं में छिपा है। कश्मीर घाटी में गांव अपेक्षाकृत पास-पास हैं, जबकि जम्मू के पहाड़ी इलाकों में गांव बिखरे हुए हैं। सीमित सड़कें और लंबी दूरी सुरक्षा बलों की त्वरित पहुंच में बाधा बनती हैं।
पूर्व DGP वैद के मुताबिक, अगर स्थानीय लोग हथियारबंद और प्रशिक्षित न होते तो 1990 के दशक में जम्मू क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार हो सकता था। VDG ने न सिर्फ आतंकियों की योजनाओं को नाकाम किया, बल्कि उन्हें स्थायी ठिकाने बनाने से भी रोका।
VDG न होते तो क्या होता: जमीनी हकीकत
डोडा, किश्तवाड़, राजौरी और पुंछ के पहाड़ी गांवों में VDG सदस्यों ने रात-रात भर आतंकियों से मुकाबला किया है। कई बार गोला-बारूद खत्म होने तक संघर्ष चलता रहा। इस दौरान कई स्थानीय लोगों ने अपनी जान भी गंवाई, लेकिन उनके साहस ने बड़े हमलों को रोका। यही वजह है कि VDG को जम्मू क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
गृह मंत्रालय के 2022 के आदेश: संरचना और मानदेय
14 अगस्त 2022 को गृह मंत्रालय ने VDG को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए। इसके तहत VDG को छोटे-छोटे ग्रुप बनाने, दिन-रात गश्त करने और remote areas में सतर्क रहने का निर्देश दिया गया। VDG दो श्रेणियों में बांटे गए हैं। V1 कैटेगरी में ग्रुप लीडर होता है, जिसे ₹4500 मासिक मानदेय और wireless set मिलता है। V2 कैटेगरी में ग्रुप मेंबर्स होते हैं, जिन्हें ₹4000 प्रतिमाह दिए जाते हैं। सभी के पास हथियार लाइसेंस होना अनिवार्य है।
आतंकियों की नजर में VDG: प्रोपेगैंडा का खुलासा
VDG की बढ़ती भूमिका से आतंकी संगठन भी परेशान हैं। 33 साल से फरार आतंकी जहांगीर सरूरी के एक प्रोपेगैंडा इंटरव्यू में यह स्वीकार किया गया कि भारतीय सेना स्थानीय युवाओं को हथियार और ट्रेनिंग दे रही है। यह बयान खुद इस बात का सबूत है कि VDG मॉडल आतंकियों के लिए चुनौती बन चुका है।
गांवों की सुरक्षा का मजबूत मॉडल
डोडा की अनीता, सोनाली और मधुबाला जैसी महिलाएं आज सिर्फ अपने घरों की नहीं, बल्कि पूरे गांव की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। Village Defence Guards ने जम्मू के पहाड़ी इलाकों में आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत, स्थानीय और प्रभावी सुरक्षा मॉडल खड़ा किया है। महिलाओं की भागीदारी ने इस मॉडल को और सशक्त बनाया है।
आज VDG सिर्फ एक सुरक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, साहस और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक बन चुका है। जम्मू-कश्मीर के चुनौतीपूर्ण इलाकों में यह मॉडल आने वाले समय में internal security और counter terrorism strategy का अहम हिस्सा बना रहेगा।