PKN Live | उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ते Monkey Menace in UP को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। आम नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक संपत्ति को हो रहे नुकसान और रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़ती परेशानी को गंभीर मानते हुए अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह बंदरों के आतंक से निपटने के लिए एक Detailed Action Plan पेश करे।
यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किया। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पहले दिए गए आदेशों के बावजूद अब तक कोई ठोस और प्रभावी योजना सामने नहीं आई है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
किस बेंच ने दिया आदेश
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने की।
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बंदरों का आतंक अब केवल वन्यजीव या पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह Public Safety Issue बन चुका है, जिस पर सरकार को टालमटोल छोड़कर तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे।
बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से क्या दलील दी गई
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दोनों अधिवक्ताओं पवन कुमार तिवारी और आकाश वशिष्ठ ने अदालत के समक्ष विभिन्न प्रमुख अख़बारों की newspaper cuttings पेश कीं।
दोनों अधिवक्ताओं ने खंडपीठ को अवगत कराया कि Monkey Menace की समस्या केवल गाजियाबाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर प्रदेश में गंभीर रूप ले चुकी है।
उन्होंने तर्क दिया कि राज्य के अलग-अलग जिलों से लगातार बंदरों के हमलों, आम नागरिकों के घायल होने, संपत्ति को नुकसान और सार्वजनिक स्थलों पर अव्यवस्था की खबरें सामने आ रही हैं, जो यह साबित करती हैं कि यह एक State-wide Public Safety Issue है, न कि किसी एक शहर की स्थानीय समस्या।
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि यदि इस समस्या से निपटने के लिए राज्य स्तरीय समन्वित नीति नहीं बनाई गई, तो हालात और अधिक बेकाबू हो सकते हैं।
जनहित याचिका में क्या कहा गया
यह मामला गाजियाबाद निवासी विनीत शर्मा और प्रजक्ता सिंघल द्वारा दायर जनहित याचिका के जरिए अदालत के सामने आया। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि
शहरी और ग्रामीण इलाकों में बंदरों का आतंक तेजी से बढ़ रहा है
लोग घरों से निकलने में डर रहे हैं
बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर हमले की घटनाएं बढ़ी हैं
स्कूल, अस्पताल और सरकारी दफ्तर भी प्रभावित हो रहे हैं
याचिका में यह भी कहा गया कि UP Monkey Menace Problem को लेकर सरकार के पास कोई समन्वित नीति नहीं है, जिससे हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
पहले भी दिया जा चुका है आदेश
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अपने 3 दिसंबर 2025 के आदेश का भी उल्लेख किया। उस समय भी राज्य सरकार को बंदरों के आतंक से निपटने के लिए कार्ययोजना तैयार करने को कहा गया था।
हालांकि, अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इतने समय बाद भी सरकार की ओर से केवल बैठकों और फाइलों का हवाला दिया जा रहा है, जबकि ज़मीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
सरकार की ओर से क्या कहा गया
सुनवाई के दौरान Additional Advocate General ने अदालत के सामने 8 जनवरी 2026 को हुई एक अहम बैठक के मिनट्स प्रस्तुत किए। इसमें यह निर्णय लिया गया था कि बंदरों के आतंक को नियंत्रित करने की मुख्य जिम्मेदारी Environment, Forest and Climate Change Department की होगी।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि Animal Welfare Board of India ने इस समस्या से निपटने के लिए एक प्रस्तावित एक्शन प्लान तैयार किया है। इस योजना पर पर्यावरण विभाग विचार कर रहा है और इसे अंतिम रूप देने में लगभग एक माह का समय लग सकता है।
कोर्ट की टिप्पणी: जिम्मेदारी तय होनी चाहिए
हाई कोर्ट ने सरकार के इस रुख पर असंतोष जताते हुए कहा कि
अलग-अलग विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं
कोई भी विभाग स्पष्ट रूप से आगे आकर नेतृत्व नहीं कर रहा
समस्या गंभीर है और इसमें देरी लोगों की जान पर भारी पड़ सकती है
कोर्ट ने कहा कि Departmental Blame Shifting अब स्वीकार्य नहीं है और सरकार को यह तय करना होगा कि कौन सा विभाग नोडल एजेंसी होगा और कौन-कौन सहयोग करेगा।
क्या चाहता है हाई कोर्ट
अदालत ने साफ किया कि सरकार को केवल प्रस्ताव या सिफारिशें नहीं, बल्कि Implementable Action Plan पेश करना होगा। इसमें शामिल होना चाहिए
बंदरों की अधिक समस्या वाले क्षेत्रों की पहचान
शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए अलग-अलग रणनीति
वन विभाग, नगर निकाय और पुलिस के बीच समन्वय
पशु कल्याण और पर्यावरण संतुलन का ध्यान
दीर्घकालिक समाधान, न कि केवल अस्थायी उपाय
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर National Board of Wildlife और विशेषज्ञ संस्थाओं की मदद ली जा सकती है।
अगली सुनवाई की तारीख तय
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को एक्शन प्लान प्रस्तुत करने के लिए समय देते हुए अगली सुनवाई की तारीख 17 फरवरी 2026 तय की है।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अगली सुनवाई में केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस और समयबद्ध योजना की अपेक्षा की जाएगी।
Monkey Menace in UP: क्यों गंभीर है मामला
उत्तर प्रदेश के कई शहरों जैसे लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, प्रयागराज, वाराणसी और कानपुर में बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है।
लोग छतों पर नहीं जा पा रहे
दुकानें और बाजार प्रभावित हैं
धार्मिक स्थलों के आसपास हालात और गंभीर हैं
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के सिकुड़ने, शहरीकरण और भोजन की कमी के कारण बंदर रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं।
समाधान की दिशा में अदालत की भूमिका
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह मामला सिर्फ बंदरों के आतंक तक सीमित नहीं है। यह Urban Wildlife Management in India से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा है।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि अगर सरकारें समय पर समाधान नहीं करतीं, तो न्यायपालिका को आगे आकर हस्तक्षेप करना पड़ता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश उत्तर प्रदेश में बंदरों के आतंक से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है। अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है कि वह Monkey Menace Control Plan को कितनी गंभीरता से लेती है।
अगर 17 फरवरी 2026 तक ठोस कार्ययोजना सामने नहीं आती, तो यह मामला और सख्त निर्देशों की ओर बढ़ सकता है। फिलहाल, हाई कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि बंदरों के आतंक को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं होगा।